पूरी दुनिया में दिन-प्रति-दिन हाहाकार बढ़ता ही जा रहा है। हाहाकार का एक बड़ा कारण अन्याय का बढ़ता हुआ दायरा है। संगठित अन्याय और असंगठित न्याय का यह दौर बहुत भयानक है। विडंबना है कि दिन-प्रति-दिन न्याय असंगठित होता गया है और अन्याय संगठित होता गया है। राज्य संरचना को आपराधिक संरचना बहुत तेजी से आच्छादित कर रही है। इस का एक बड़ा कारण है कि आपराधिक मनोभाव और मनोवृत्ति के साथ लोग सत्ता के प्रमुख केंद्रों पर कब्जा जमाने में कामयाब होते गये हैं।
मयस्सर नहीं इंसा होना
मनुष्य अपनी आदिम और जैविक मनोवृत्तियों पर काबू नहीं पा सका है, बल्कि सोवियत संघ के बिखरते जाने या कह लें दुनिया पर बढ़ते हुए उदारवादी वर्चस्व के साथ-साथ संगठित अन्याय का दायरा भी बढ़ता गया है। विश्व-व्यवस्था में कम्युनिस्टों के प्रभाव को साफ और सकारात्मक नजर से नहीं देखनेवालों को भी अपने तरीके से अन्याय के संगठित होते जाने और न्याय के असंगठित होते जाने के कारणों की खोजबीन करनी चाहिए।
आज नहीं तो कल इस सवाल का जवाब तो देना ही होगा कि दुनिया भर की सरकारों में बढ़ती हुई आपराधिक मनोवृत्तियों के कारण क्या रहे हैं। जनतांत्रिक या लोकतांत्रिक सरकारों में सत्ता का अति-केंद्रीयकरण और सामाजिक वितरण के नाम पर सत्ता का बहु-विकेंद्रीयकरण दोनों ही संविधान विरोधी होता है; दोनों ही रास्ता सत्ता में अपराध की पहुंच के लिए खुला रहता है।
अनिश्चयता अस्थिरता और थरथराहट के दौर में न्याय
वैश्विक और घरेलू स्तर पर सत्ता की संरचना आपराधिक बन गई है। ऐसे अनिश्चित, अस्थिर और थरथराते वातावरण में न्याय की अवधारणाओं पर बात करने, उसे समझने की कोशिशों का अपना जोखिम होता है। जोखिम चाहे जितना हो, बात तो करनी होगी, करनी ही होगी! पूरी दुनिया के विभिन्न देशों की व्यवस्था में अन्याय का इतना जबरदस्त दखल शायद कभी नहीं था!
पूरी दुनिया में काफी हलचल मची हुई है। इन हलचलों का राष्ट्रीय प्रसंग भी है और अंतरराष्ट्रीय प्रसंग भी है। उदाहरण कई हैं हाल के दिनों पर नजर दौड़ायें तो अक्तूबर 2023 से शुरू हुए गाजा मानवीय संकट पर नजर टिक ही नहीं जाती बल्कि शर्म से झुक जाती है। यूक्रेन पर रूस का आक्रमण और संप्रभुता का हनन साल 2022 से जारी इस युद्ध ने एक संप्रभु राष्ट्र की स्वतंत्रता और उसके नागरिकों के शांति से जीने के अधिकार को बेरहमी से कुचला है।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या 28 फरवरी 2026 से जुड़े अन्याय का मामला न्याय के संवेदनशील मुद्दों में से एक है — किसी राज्य का सर काट लेने डिकैपिटेशन की घटना है। लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे न्याय बताया!
थूको-चाटो के दौर में बेमिसाल शहादत
शहादत में कोई शोक नहीं होता है — शहादत में होता है समुल्लास। ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत के समुल्लास के दौर में ईरानी लोगों पर युनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका के सेंट्रल कमांड का डबल अटैक सत्ता के आपराधिक मनोभाव का भयानक उदाहरण है। बार-बार बयान बदलना, झूठ बोलना, न थूकते देरी, न चाटते देरी! थूको-चाटो के दौर में बेमिसाल शहादत! होगा वहां भी बहुत-कुछ जो नहीं होना चाहिए, लेकिन जो होना चाहिए यह तय करने का जिन्हें हक है उन की एक आंख नम है तो दूसरी आंख में आग है।
सर के ऊपर धरती, पैर के नीचे आसमान
पूरे भारत में, खासकर उत्तर भारत में, अधिकतर मामलों में अल्पसंख्यक, दलित पिछड़ा समुदाय के नागरिकों के साथ छोटे-छोटे स्तर पर अत्याचार लगातार होते रहते हैं, समाज में शांति बनी रहती है जैसे तालाब के पानी में लगातार बुलबुले फूटते रहते हैं, लेकिन तालाब में शांति बनी रहती है — तालाब में बुलबुलों के फूटने से तालाब अशांत नहीं होता है।
मई 2023 से मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा पर सरकार का रुख और रवैया भारत के हालिया इतिहास का एक बेहद दर्दनाक अन्याय का नमूना है। मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) हुई और लाखों-करोड़ों नाम मतदाता सूची से निकाल दिये गये। विचाराधीन लोगों की बेचैनियों को ताड़ती हुई न्याय की सब से ऊंची और बड़ी आवाज आई — इस बार न सही, अगली बार! अगली बार मताधिकार का इस्तेमाल कर लेना! क्या यह अन्याय का उदाहरण नहीं है?
सब-कुछ उलटा-पुलटा! सर के ऊपर धरती, पैर के नीचे आसमान! 1026 ईस्वी में गजनी की गजबए हिंद के मचाये लूट की ओट में 2026 की लूट को भगवए हिंद छिपा रहे हैं! पूजा पर पूंजी भारी है!
न चित्त भय शून्य, न माथा ऊंचा
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से जो सत्ता प्रेरित सामाजिक उथल-पुथल चल रहा है उसमें न्याय की कोई भावना ही नहीं है। सत्ता के चित्त में अन्याय का कोई भय नहीं; जनता के चित्त में भयंकर भय! प्लेटो के अनुसार, न्याय आत्मा का गुण है! लाख टके का सवाल यह है कि किस की आत्मा का गुण! विश्व-व्यवस्था की आत्मा का गुण! राष्ट्र की आत्मा का गुण! राष्ट्रवाद की आत्मा का गुण!
राजनीतिक संगठनों की आत्मा का गुण! न्यायाधीशों की आत्मा का गुण! रात-दिन हेट स्पीच करते नेताओं की आत्मा गुण! क्या पता! क्या पता क्यों किसी की आत्मा नहीं सिहरती — क्यों नहीं कहीं कोई सिहरन होती!
सूख गया, आंख का पानी तो सूख गई पूरी आकाश गंगा। सूख गई तर्क की धारा, रुद्ध हो गई विवेक की वाणी! विकलांग विवेक के हाथ की थाली में न्याय की हैसियत बैंगन से अधिक नहीं होती! थाली के बैंगन की हैसियत नहीं होती है कि चित्त के भय शून्य होने और माथा के ऊंचा होने का अवसर बनाये!
राष्ट्र की आंख नहीं न्याय की आंख खुली नहीं
न्याय के कई प्रसंग हैं। कुछ प्रसंगों की चर्चा जरूरी है। आज की दुनिया का मुख्य संदर्भ, अबतक, लोकतंत्र की आकांक्षाओं से तय होता आया है। ‘अबतक’ तो ठीक लेकिन लाख टके का सवाल है कि ‘कब तक’! कब तक न्याय की बात का संदर्भ यानी थिमेटिक आधार लोकतंत्र बना रहेगा! कम-से-कम भारत की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि लोकतंत्र को अब अपने ही घर में राजनीति ने मेहमान बना दिया है — राजनीति के घर में मेहमान की विदाई की धुन बनाई जा रही है, बजाई जा रही है।
कहना न होगा कि लोकतंत्र एक राजनीतिक उत्पाद है, जाहिर है कि राजनीति से लोकतंत्र की गुणवत्ता तय होती रहती है। गुणवत्तापूर्ण लोकतंत्र ही न्याय की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। लेकिन राजनीतिक संगठन को आंख नहीं, न्याय की आंख पर पट्टी और पार्लियामेंट के कान नहीं! कौन यहां खुली आंखवाला है, कौन यहां चौकन्ना है! लोकतंत्र की कैसी गुणवत्ता और कैसी तो न्याय की गुणवत्ता!
बहुत पवित्र है जो, वह जमीन पर न उतरे
भारत में लोकतंत्र का आधार संविधान है। मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व संविधान में शामिल होना भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक न्याय की सक्रिय स्वीकृति का सबूत है। भारत का संविधान वितरणात्मक न्याय और सुधारात्मक न्याय दोनों के समुचित प्रावधानों के लिए जगह बनाता है। न्याय के प्रति वास्तविक और तात्विक आग्रह से भारत के संविधान का बुनियादी ढांचा बना है। न्याय का प्रसंग केवल अदालतों तक सीमित नहीं है। भारत का संविधान जीवित जीवन दर्शन है।
फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि अलग-अलग कारणों से अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को इस संविधान से शिकायत भी रही है। शिकायतियों की पहली जमात इस जीवित जीवन दर्शन के सही तरीके से जमीन उतरने में देरी और समय पर रुकावटों से पार नहीं पा सकने से है।
सुधार और समन्वय की संवैधानिक प्रक्रिया अपनी जगह, लेकिन समानता की संवैधानिक प्रतिबद्धता के बावजूद, विषमता की खाई की गहराई और चौड़ाई का निरंतर बढ़ते जाने का घिनौना और घूर्णन संबंध न्याय वंचना और निश्चित अन्याय से है। जाहिर है कि शिकायत संविधान से नहीं संविधान को लागू करने के तौर-तरीका से है। बाबासाहेब ने संविधान की गुणवत्ता के लिए इसे लागू करनेवालों के इरादों की तरफ इशारा किया था।
इस तरह की शिकायतें उतनी ही दूर तक जाती हैं जितने की इजाजत संविधान देता है; व्यावहारिक अर्थ में सरकार ही यदि संविधान हो जाए तो शिकायतें उतनी ही दूर तक शिकायत रहती है जितनी दूर तक सरकार चाहे। सरकार जिन शिकायतों को नापसंद करती है उन्हें राजद्रोह के खाते में दर्ज कर लगती है।
बहुत पवित्र है तो क्या वह जमीन पर न उतरेगा! उतरेगा तो क्या है फिर संविधान को लागू करने का तरीका! लागू करने के तौर-तरीके या लागू करनेवालों के राजनीतिक रुख और रवैया प्रति विरोध का मतलब संविधान और संवैधानिक लोकतंत्र का विरोध करना नहीं होता है, लेकिन सरकारी लोग ऐसा ही मान बैठे हैं।
वे मानते हैं कि जितनी की अनुमति अधिकारी या सरकार के नुमाइंदे देते हैं, बुरा असर उतनी की ही अनुमति संविधान देता है। वे मानते हैं! लेकिन जो वे मानते हैं, वही सच है। क्या संविधान उतनी ही अनुमति देता है! पूछिए, मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार से!
कुछ अन्य लोगों को भी संविधान अच्छा नहीं लगता रहा था
संविधान से शिकायत कुछ अन्य लोगों को भी है। लेकिन इन अन्य लोगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस के आनुषंगिक राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी भारत का सत्ताधारी दल है; शासक दल के रूप में भाजपा के हाथ में आज भारत की राज्य-शक्ति है। सत्ता सुख की संभावनाओं के चलते धीरे-धीरे अपने रुख में रणनीतिक परिवर्तन कर लिया। इनकी शिकायतों और विरोध का कुल सारांश संविधान के जीवंत जीवन दर्शन से है।
यह रणनीतिक परिवर्तन से सत्ता-समर्थित सहूलियतें तो मिल गयी लेकिन रणनीति के झोंझ से बाहर निकलकर नीति पर लौटने की छटपटाहट में फंसी है। लेकिन क्या यह सच है! सच है लेकिन सच इतना ही नहीं है। नरेंद्र मोदी के शासन काल में चौतरफा लूट मची हुई है और भगवान भी लुट जाने से बच नहीं पाये। जी श्रद्धालुओं का मन डोल रहा है कि सचमुच प्रभु श्री राम भी लुट गये! लूटनेवाले अगर पकड़े जायेंगे तो नापसंद रहे इस संविधान के कानूनी हवाले से!
उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि प्रार्थना की प्रेरणा से बहुत-कुछ हुआ इस देश में लेकिन संविधान की प्रेरणा से बहुत-कुछ होने की संभावनाएं अभी बाकी हैं — रामधारी सिंह दिनकर ने सिर्फ यह नहीं लिखा कि सौभाग्य न सब दिन सोता है, यह भी लिखा कि देखें आगे क्या होता है। आगे! आगे तो यह कि अभी समर शेष है।
सरकार आका, नागरिक गुलाम
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया एक पंजीकृत किंतु गैर-मान्यता प्राप्तराजनीतिक दल है। इस के नेता सईद अहमद पर आरोप था कि उन्होंने भाजपा और अमित शाह के खिलाफ मुर्दाबाद का नारा लगाया था। नारेबाजी करने के हवाले से एसडीपीआई के नेता सईद अहमद को एक साल के लिए जिला बदर करने के पुलिस के आदेश को जस्टिस माधव जे. जामदारने पूरी तरह खारिज कर दिया।
मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार के इस फैसले को बहुत दिनों तक याद किया जाता रहेगा। मुंबई पुलिस ने भाजपा और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ मुर्दाबाद का नारे लगाने और प्रदर्शन करनेवाले एसडीपीआई के नेता सईद अहमद को एक साल के लिए जिला बदर करने के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस और सरकार के रवैये पर बेहद तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणियां की है; जैसे कि नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है! यह भी कि पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है।
लोकतांत्रिक सरकारों और सरकार की नीतियों, सरकार के अधिकारियों के प्रति असहमत होने, उस का विरोध करने की अनुमति संविधान देता है। लेकिन वर्तमान सरकार और उस के लगुए-भगुए ऐसा कोहराम खड़ करते हैं कि साधारण लोगों के द्वारा सरकार का विरोध राजद्रोह लगने लगता है।
लगुआ-भगुआ के लोकतंत्र में लगभग न्याय
कुल मिलाकर लगुआ-भगुआ लोकतंत्र में नागरिकों को लगभग न्याय ही मिलता है। लगभग न्याय और लगभग अन्याय में बहुत का अंतर नहीं रहता है।
न्याय की अवधारणाओं के कई पक्ष हैं, कई आयाम हैं लेकिन यह सच है कि इस समय ये सब अन्याय और अपराध के सूत्रों से आच्छादित हैं। आज की दुनिया में न्याय का स्वरूप अदालती न्याय से बनता है। लेकिन ठहरिए, न्याय के सारे स्वरूपों और अवधारणाओं का समाहारी संहार है — बुलडोजर न्याय!
मनुष्य अभाव से जितना परेशान है उस से किसी भी सूरत में उस से कम उत्पीड़ित अन्याय से नहीं है। सब से बड़ी मुसीबत यह है कि दोस्तों की उपस्थिति राहतों का जितना बड़ा आश्वासन हो, दोस्तों के दंश भी कम बेरहम नहीं रहे हैं।
(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक, आलोचक, सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)